सुनकर बिरद तुम्हारा, तेरी शरण में आया । तुमसा न देव मैंने, कोई कहीं है पाया । सर्वज्ञ वीतरागी सच्चे हितोपदेशक दर्शन से नाथ तेरे कटते हैं पाप बेशक ॥ आगया..१॥
चारों गति के दुख जो, मैंने भुगत लिये हैं । तुमसे छिपे नहीं हैं, जो जो करम किये हैं । अब तो जनम मरण की काटो हमारी फ़ांसी २ वरना हंसेगी दुनिया, बिगडेगी बात खासी ॥ आगया..२॥
अंजन से चोर को भी, तुमने किया निरंजन । श्रीपाल कोडि की भी, काया बना दी कंचन । मेंढक सा जीव भी जब, तेरे नाम से तिरा है २ पंकज ये सोच तेरे, चरणों में आ गिरा है ॥ आगया..३॥