गंगा कल-कल स्वर में गाती, तव गुण गौरव गाथा, सुर नर मुनि वर तब पद युग में नित निज करते माथा । हम भी तब यश गाते सादर शीष झुकाते, हे सद्बुद्धि प्रदाता, दुख हारक सुख कारक जय है, सन्मति युग निर्माता, जय हे, जय हे, जय, जय, जय, जय हे ॥
मंगल कारक दया प्रचारक, खग पशु नर उपकारी, भविजन तारक, कर्म विदारक, सब जग तव आभारी, जब तक रवि शशि तारे, तब तक गीत तुम्हारे, विश्व रहेगा गाता, हे दुर्जय! दुख त्रायक जय हे! सन्मति युग निर्माता, जय हे, जय हे, जय, जय, जय, जय हे ॥
भ्रात भावना, भुला परस्पर लड़ते हैं जो प्राणी, उनके उर में विश्व प्रेम फिर, भरे तुम्हारी वाणी, सब में करुणा जागे, जग से हिंसा भागे, चिर सुख शांति विधायक, जय हे! सन्मति युग निर्माता, जय हे, जय हे, जय हे, जय, जय, जय, जय हे ॥