चंद्रानन
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तर्ज : देखो जी आदीश्वर स्वामी
चन्द्रानन जिन चन्द्रनाथ के, चरन चतुर-चित ध्यावतुमहैं ।
कर्म-चक्र-चकचूर चिदातम, चिनमूरत पद पावतुमहैं ॥टेक॥
हाहा-हूहू-नारद-तुंबर, जासु अमल जस गावतुमहैं ।
पद्मा सची शिवा श्यामादिक, करधर बीन बजावतुमहैं ॥१॥
बिन इच्छा उपदेश माहिं हित, अहित जगत दरसावतुमहैं ।
जा पदतट सुर नर मुनि घट चिर, विकट विमोह नशावतुमहैं ॥२॥
जाकी चन्द्र बरन तनदुतिसों, कोटिक सूर छिपावतुमहैं ।
आतमजोत उदोतमाहिं सब, ज्ञेय अनंत दिपावतुमहैं ॥३॥
नित्य-उदय अकलंक अछीन सु, मुनि-उडु-चित्त रमावतुमहैं ।
जाकी ज्ञानचन्द्रिका लोका-लोक माहिं न समावतुमहैं ॥४॥
साम्यसिंधु-वर्द्धन जगनंदन, को शिर हरिगन नावतुमहैं ।
संशय विभ्रम मोह 'दौल' के, हर जो जगभरमावतुमहैं ॥५॥