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श्री
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जिनवर दरबार तुम्हारा
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तर्ज : सूरज कब दूर गगन से

जिनवर दरबार तुम्हारा, स्वर्गों से ज्यादा प्यारा ।
वीतराग मुद्रा से परिणामों में उजियारा ।
ऐसा तो हमारा भगवन है, चरणों में समर्पित जीवन है ॥

समवसरण के अंदर, स्वर्ण कमल पर आसन,
चार चतुष्टय धारी, बैठे हो पद्मासन ।
परिणामों में निर्मलता, तुमको लखने से आये,
फ़िर वीतरागता बढती, जो जिनवर दर्शन पाये ॥
ऐसा तो हमारा...

त्रैलोक्य झलकता भगवन, कैवल्य कला में,
तीनों ही कालों में कब क्या होगा कैसे ।
जग के सारे ज्ञेयों को, तुम एक समय में जानो,
निज में ही तन्मय रहते, उनको न अपना मानो ॥
ऐसा तो हमारा...

दिव्यध्वनि के द्वारा, मोक्ष मार्ग दर्शाया,
प्रभु अवलंबन लेकर, मैंने भी निजपद पाया ।
मैं भी तुमसा बनने को, अब भेदज्ञान प्रगटाऊं,
निज परिणति में ही रमकर, अब सम्यकदर्शन पाऊं ॥
ऐसा तो हमारा...


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