जिनवर दरबार तुम्हारा, स्वर्गों से ज्यादा प्यारा । वीतराग मुद्रा से परिणामों में उजियारा । ऐसा तो हमारा भगवन है, चरणों में समर्पित जीवन है ॥
समवसरण के अंदर, स्वर्ण कमल पर आसन, चार चतुष्टय धारी, बैठे हो पद्मासन । परिणामों में निर्मलता, तुमको लखने से आये, फ़िर वीतरागता बढती, जो जिनवर दर्शन पाये ॥ ऐसा तो हमारा...
त्रैलोक्य झलकता भगवन, कैवल्य कला में, तीनों ही कालों में कब क्या होगा कैसे । जग के सारे ज्ञेयों को, तुम एक समय में जानो, निज में ही तन्मय रहते, उनको न अपना मानो ॥ ऐसा तो हमारा...
दिव्यध्वनि के द्वारा, मोक्ष मार्ग दर्शाया, प्रभु अवलंबन लेकर, मैंने भी निजपद पाया । मैं भी तुमसा बनने को, अब भेदज्ञान प्रगटाऊं, निज परिणति में ही रमकर, अब सम्यकदर्शन पाऊं ॥ ऐसा तो हमारा...