तुम जैसा मैं भी बन जाऊं, ऐसा मैंने सोचा है, तुम जैसी समता पा जाऊं, ऐसा मैंने सोचा है ।
भव वन में भटक रहा भगवन, ऐसी चिन्मूरत न पाई है । तेरे दर्शन से निज दर्शन की, सुधि अपने आप ही आई है । शांति प्रदाता मंगलदाता, मुश्किल से मैंने खोजा है, तुम जैसी समता पा जाऊं, ऐसा मैंने सोचा है ॥१॥
कितनी प्रतिकूल परिस्थिति में, मुझको वैराग्य न आता है । संसार असार नहीं लगता, मन राग रंग में जाता है । विषय वासना की जड गहरी, काटो नाथ भरोसा है, तुम जैसी समता पा जाऊं, ऐसा मैंने सोचा है ॥२॥
हे जिनधर्म के प्रेमी सुन लो, कह गये कुंद कुंद स्वामी । भव सागर से तिरने में फ़िर, कल्याणी माँ श्री जिनवाणी । रूप तुम्हारा सबसे न्यारा, करना सिर्फ़ भरोसा है, तुम जैसी समता पा जाऊं, ऐसा मैंने सोचा है ॥३॥