हे जिन मेरी ऐसी बुधि
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हे जिन मेरी ऐसी बुधि कीजै ॥टेक॥
राग-द्वेष दावानल तें बचि, समता रस में भीजै ॥1॥
पर को त्याग अपनपो निज में, लाग न कबहूँ छीजै ॥2॥
कर्म कर्मफल माँहि न राचै, ज्ञान सुधारस पीजै ॥3॥
मुझ कारज के तुम कारण वर, अरज 'दौल' की लीजै ॥4॥