जिन बैन सुनत मोरी
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जिन बैन सुनत मोरी भूल भगी ॥टेक॥
कर्म-स्वभाव भाव चेतन को, भिन्न पिछानत सुमति जगी ॥१॥
निज अनुभूति सहज ज्ञायकता, सो चिर रुष-तुष-मैल पगी ॥२॥
स्यादवाद धुनी निर्मल जलतैं, विमल भई समभाव लगी ॥३॥
संशय-मोह-भरमता विघटी, प्रगटी आतम सोंज सगी ॥४॥
'दौल' अपूरव मंगल पायौ, शिवसुख लेन होंस उमगी ॥५॥