गुरु निर्ग्रन्थ परिग्रह त्यागी
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गुरु निर्ग्रन्थ परिग्रह त्यागी, भव-तन-भोगों से वैरागी ।
आशा पाशी जिनने छेदी, आनंदमय समता रस वेदी ॥टेक॥
ज्ञान-ध्यान-तप लीन रहावें, ऐसे गुरुवर मोकों भावें ।
हरष-हरष उनके गुण गाऊँ, साक्षात् दर्शन मैं पाऊँ ॥१॥
उनके चरणों शीश नवाकर, ज्ञानमयी वैराग्य बढ़ाकर ।
उनके ढिंग ही दीक्षा धारुं, अपना पंचम भाव संभारुँ ॥२॥
सकल प्रपंच रहित हो निर्भय, साधूँ आतम प्रभुता अक्षय ।
ध्यान अग्नि में कर्म जलाऊँ, दुखमय आवागमन नशाऊँ ॥३॥