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वनवासी सन्तों को नित ही
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वनवासी सन्तों को नित ही, अगणित बार नमन हो ।
द्रव्य-नमन हो भाव-नमन हो, अरु परमार्थ-नमन हो ॥टेक॥

गृहस्थ अवस्था से मुख मोड़ा, सब आरम्भ परिग्रह छोड़ा ।
ज्ञान ध्यान तप लीन मुनीश्वर, अगणित बार नमन हो ॥१॥

जग विषयों से रहे उदासी, तोड़ी जिनने आशा पाशी ।
ज्ञानानंद विलासी गुरुवर, अगणित बार नमन हो ॥२॥

अहंकार ममकार न लावें, अंतरंग में निज पद ध्यावें ।
सहज परम निर्ग्रन्थ दिगम्बर, अगणित बार नमन हो ॥३॥

ख्यातिलाभ की नहिं अभिलाषा, सारभूत शुद्धातम भासा ।
आतमलीन विरक्त देह से, अगणित बार नमन हो ॥४॥

उपसर्गों में नहिं अकुलावें, परीषहों से नहीं चिगावें ।
सहज शान्त समता के धारक, अगणित बार नमन हो ॥५॥

जिनशासन का मर्म बतावें, शाश्वतसुख का मार्ग दिखावें ।
अहो-अहो जिनवर से मुनिवर, अगणित बार नमन हो ॥६॥

ऐसा ही पुरुषार्थ जगावें, धनि निर्ग्रन्थ दशा प्रगटावें ।
समय-समय निर्ग्रन्थ रूप का, सहजपने सुमिरन हो ॥७॥