ऋषभदेव जनम्यौ
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राग : विलावल
ऋषभदेव जनम्यौ धन घरी ।
इन्द्र नचें गंधर्व बजावैं, किन्नर बहु रस भरी ॥टेक॥
पट आभूषन पुहुपमालसों, सहसबाहु सुरतरु ह्वै हरी ।
दश अवतार स्वांग विधि पूरन, नाच्यो शक्र भगति उर धरी ॥
ऋषभदेव जनम्यौ धन घरी ॥1॥
हाथ हजार सबनिपै अपछर, उछरत नभमैं चहुँदिशि फरी ।
करी करन अपछरी उछारत, ते सब नटैं गगन में खरी ॥
ऋषभदेव जनम्यौ धन घरी ॥२॥
प्रगट गुपत भूपर अंबरमें, नाचैं सबै अमर अमरी ।
'द्यानत' घर चैत्यालय कीनौं, नाभिरायजी हो लहरी ॥
ऋषभदेव जनम्यौ धन घरी ॥3॥