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चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी
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राग : सोरठ

चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥टेक॥

जबै तुम गरभ माहिं आये, तबै सब सुरगन मिलि आए
रतन नगरी में बरसाये...
ओऽऽ.... अमित अमोघ सुढार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥
चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥१॥

जन्म प्रभु तुमने जब लीना, न्हवन मन्दिरपै हरि कीना
भक्त करि शची सहित भीना...
ओऽऽ... बोले जयजयकार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥
चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥२॥

अथिर जग तुमने जब जाना, स्तवन लौकांतिक सुर ठाना
भये प्रभु जती नगन बाना....
ओऽऽ....त्यागराज को भार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥
चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥३॥

घातिया प्रकृति जबै नासी, चराचर वस्तु सबै भासी
धर्म की वृष्टि करी ख़ासी...
ओऽऽ... केवल ज्ञान भंडार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥
चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥४॥

अघातिया प्रकृति जो विघटाई, मुक्ति कांता तब ही पाई
निराकुल आनंद सुखदाई...
ओऽऽ ...तीन लोक सिरताज स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥
चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥५॥

पार गणधर हूं नहिं पावै, कहाँ लगि 'भागचन्द' गावे
तुम्हारे चरनांबुज ध्यावै...
ओऽऽ...भवसागर सो तार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥
चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥६॥