चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥टेक॥
जबै तुम गरभ माहिं आये, तबै सब सुरगन मिलि आए रतन नगरी में बरसाये... ओऽऽ.... अमित अमोघ सुढार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥ चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥१॥
जन्म प्रभु तुमने जब लीना, न्हवन मन्दिरपै हरि कीना भक्त करि शची सहित भीना... ओऽऽ... बोले जयजयकार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥ चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥२॥
अथिर जग तुमने जब जाना, स्तवन लौकांतिक सुर ठाना भये प्रभु जती नगन बाना.... ओऽऽ....त्यागराज को भार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥ चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥३॥
घातिया प्रकृति जबै नासी, चराचर वस्तु सबै भासी धर्म की वृष्टि करी ख़ासी... ओऽऽ... केवल ज्ञान भंडार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥ चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥४॥
अघातिया प्रकृति जो विघटाई, मुक्ति कांता तब ही पाई निराकुल आनंद सुखदाई... ओऽऽ ...तीन लोक सिरताज स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥ चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥५॥
पार गणधर हूं नहिं पावै, कहाँ लगि 'भागचन्द' गावे तुम्हारे चरनांबुज ध्यावै... ओऽऽ...भवसागर सो तार स्वामी जी...तुम गुण अपरंपार ॥ चन्द्रोज्वल अविकार स्वामी जी, तुम गुण अपरंपार ॥६॥