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श्री
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सुरपति ले अपने शीश
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सुरपति ले अपने शीश, जगत के ईश, गए गिरिराजा
जा पांडुक शिला विराजा ॥
फ़िर न्हवन कियो जिनराजा ॥

शिल्पी कुबेर वहां आकर के क्षीरोदधि का जल लाकर के,
रुचि पैडि ले आये, सागर का जल ताजा ॥फ़िर॥

नीलम पन्ना वैडूर्यमणी, कलशा लेकर के देवगणी,
इक सहस आठ कलशा लेकर नभ राजा ॥फ़िर॥

वसु योजन गहराई वाले, चहुं योजन चौडाई वाले,
इक योजन मुख के कलश ढूरे जिनमाथा ॥फ़िर॥

सौधर्म इंद्र अरु ईशाना, प्रभु कलश करें धर युग पाना,
अरु सनत्कुमार महेन्द्र, दोय सुरराजा ॥फ़िर॥

फ़िर शेष दिविज जयकार किया, इंद्राणी प्रभु तन पोंछ लिया,
शुभ तिलक दृगांजान शची कियो शिशुराजा ॥फ़िर॥

एरावत पुनि प्रभु लाकर के माता की गोद बिठा करके,
अति अचरज तांडव नृत्य कियो दिविराजा ॥फ़िर॥

चाहत मन मुन्नालाल शरण वसु कर्म जाल दुठ दूर करन,
शुभ आशीष वरदान देहु जिनराजा, मम न्हवन होय गिरीराजा ॥

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