समरो मन्त्र भलो नवकार
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समरो मन्त्र भलो नवकार, ए छै चौदह पुरब नो सार
एहना महिमा नो नहीं पार, एहनो अर्थ अनन्त अपार ॥
सुख मा समरो, दुःख मा समरो, समरो दिवस ने रात
जीवता समरो, मरता समरो, समरो सौ संघात ॥
योगी समरे, भोगी समरे, समरे राजा रंक
देव समरे दानव समरे, समरे सहु निशंक ॥
अडसठ अक्षर एहना जाणो, अड़सठ तीरथ सार
आठ सम्पदाती परमाणो, अड सिद्धि दातार ॥
नवपद एहना नवनिधि आपै, भवभव ना दुःख कांपे
'वीर' वचन थी ह्रदय व्यापे, परमातम पद आपे ॥