पल पल जीवन बीता जाता है, बीता कल नहीं वापस आता है । लोभ मोह में तू भरमाया है, सपनों का संसार सजाया है ॥ ये सब छलावा है, ये सब भुलावा है, कर ले तू चिंतन अभी ॥ क्योंकि आत्मा अनंत गुणों का धनी, फिर भी देखो पर्यायों में रुली ॥१॥
अनहोनी क्या कभी भी होती है, होनी भी तो कभी न टलती है । काललब्धी जिसकी आ जाती है, बात समझ में तब ही आती है ॥ किसको समझाना है, किसको जगाना है, पहले तू जग जा खुद ही ॥ क्योंकि आत्मा अनंत गुणों का धनी, फिर भी देखो पर्यायों में रुली ॥२॥
समझाने से समझ नहीं आता, जब समझे तब स्वयं समझ जाता । दिव्य ध्वनि भी किसे जगाती है, स्वयं जागरण हो तब भाती है ॥ तीर्थंकर समझाया, मारीची बौराया, माने क्या किसकी कोई क्योंकि आत्मा अनंत गुणों का धनी, फिर भी देखो पर्यायों में रुली ॥३॥
साधर्मी से भी न बहस करना, और विधर्मी संग भी चुप रहना । बुद्धू बन कर चुप रह जाओगे, बहुत विवादों से बच जाओगे ॥ जीवन दो दिन का है, मौका निज हित का है, आवे न अवसर यूं ही ॥ क्योंकि आत्मा अनंत गुणों का धनी, फिर भी देखो पर्यायों में रुली ॥४॥