कर कर आतमहित रे
Karaoke :
तर्ज : मन तरपत हरि दर्शन
कर कर आतमहित रे प्रानी
जिन परिनामनि बंध होत है,
सो परनति तज दुखदानी ॥टेक॥
कौन पुरुष तुम कहाँ रहत हौ,
किहिकी संगति रति मानी ।
ये परजाय प्रगट पुद्गलमय,
ते तैं क्यों अपनी जानी ॥१॥
चेतनजोति झलक तुझमाहीं,
अनुपम सो तैं विसरानी ।
जाकी पटतर लगत आन नहिं,
दीप रतन शशि सूरानी ॥२॥
आपमें आप लखो अपनो पद,
'द्यानत' करि तन-मन-वानी ।
परमेश्वरपद आप पाइये,
यौं भाषैं केवलज्ञानी ॥३॥