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कितना सुन्दर कितना सुखमय
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कितना सुन्दर, कितना सुखमय, अहो सहज जिनपंथ है।
धन्य धन्य स्वाधीन निराकुल, मार्ग परम निर्ग्रन्थ है ।।टेक॥

श्री सर्वज्ञ प्रणेता जिसके, धर्म पिता अति उपकारी।
तत्त्वों का शुभ मर्म बताती, माँ जिनवाणी हितकारी।
अंगुली पकड़ सिखाते चलना, ज्ञानी गुरु निर्ग्रन्थ हैं ॥धन्य…॥१॥

देव शास्त्र-गुरु की श्रद्धा ही, समकित का सोपान है।
महाभाग्य से अवसर आया, करो सही पहिचान है।
पर की प्रीति महा दुख:दायी, कहा श्री भगवंत है ॥धन्य…॥२॥

निर्णय में उपयोग लगाना ही, पहला पुरुषार्थ है।
तत्त्व विचार सहित प्राणी ही, समझ सके परमार्थ है।
भेदज्ञान कर करो स्वानुभव, विलसे सौख्य बसन्त है॥धन्य…॥३॥

ज्ञानाभ्यास करो मनमाहीं, विषय-कषायों को त्यागो।
कोटि उपाय बनाय भव्य, संयम में ही नित चित पागो।
ऐसे ही परमानन्द वेदें, देखो ज्ञानी संत हैं । धन्य…।।४।।

रत्नत्रयमय अक्षय सम्पत्ति, जिनके प्रगटी सुखकारी।
अहो शुभाशुभ कर्मोदय में, परिणति रहती अविकारी ।।
उनकी चरण शरण से ही हो, दुखमय भव का अंत है। धन्य…॥५॥

क्षमाभाव हो दोषों के प्रति, क्षोभ नहीं किंचित् आवे।
समता भाव आराधन से निज, चित्त नहीं डिगने पावे ॥
उर में सदा विराजें अब तो, मंगलमय भगवंत हैं ॥धन्य…॥६॥

हो निशंक, निरपेक्ष परिणति, आराधन में लगी रहे।
क्लेशित हो नहीं पापोदय में, जिनभक्ति में पगी रहे ।।
पुण्योदय में अटक न जावे, दीखे साध्य महंत है ।।धन्य…।।७।।

परलक्षी वृत्ति ही आकर, शिवसाधन में विघ्न करे।
हो पुरुषार्थ अलौकिक ऐसा, सावधान हर समय रहे ।।
नहीं दीनता, नहीं निराशा, आतम शक्ति अनंत है ।।धन्य…।।८।।

चाहे जैसा जगत परिणमे, इष्टानिष्ट विकल्प न हो।
ऐसा सुन्दर मिला समागम, अब मिथ्या संकल्प न हो।
शान्तभाव हो प्रत्यक्ष भासे, मिटे कषाय दुरन्त है ।।धन्य…।।९।।

यही भावना प्रभो स्वप्न में भी, विराधना रंच न हो।
सत्य, सरल परिणाम रहें नित, मन में कोई प्रपंच न हो ।।
विषय कषायारम्भ रहित, आनन्दमय पद निर्ग्रन्थ है। धन्य…।।१०।।

धन्य घड़ी हो जब प्रगटावे, मंगलकारी जिनदीक्षा।
प्रचुर स्वसंवेदनमय जीवन, होय सफल तब ही शिक्षा ।
अविरल निर्मल आत्मध्यान हो, होय भ्रमण का अंत है। धन्य…।।११।।

अहो जितेन्द्रिय जितमोही ही, सहज परम पद पाता है।
समता से सम्पन्न साधु ही, सिद्ध दशा प्रगटाता है ।।
बुद्धि व्यवस्थित हुई सहज ही, यही सहज शिवपंथ है। धन्य…॥१२॥

आराधन में क्षण-क्षण बीते, हो प्रभावना सुखकारी।
इसी मार्ग में सब लग जावें, भाव यही मंगलकारी।
सद्-दृष्टि-सद्ज्ञान-चरणमय, लोकोत्तम यह पंथ है। धन्य…॥१३॥

तीनलोक अरु तीनकाल में, शरण यही है भविजन को।
द्रव्य दृष्टि से निज में पाओ, व्यर्थ न भटकाओ मन को ।।
इसी मार्ग में लगे-लगावें, वे ही सच्चे संत हैं।।धन्य. ।।14।।

है शाश्वत अकृत्रिम वस्तु, ज्ञानस्वभावी आत्मा।
जो आतम आराधन करते, बने सहज परमात्मा ।।।
परभावों से भिन्न निहारो, आप स्वयं भगवंत है।।धन्य. ।।15।।