केवलिकन्ये वाङ्गमय
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केवलिकन्ये, वाङ्गमय गंगे, जगदम्बे, अघ नाश हमारे ।
सत्य-स्वरूपे, मङ्गलरूपे, मन-मन्दिर में तिष्ठ हमारे ॥टेक॥
जम्बूस्वामी गौतम-गणधर, हुए सुधर्मा पुत्र तुम्हारे ।
जगतै स्वयं पार है करके, दे उपदेश बहुत जन तारे ॥१॥
कुन्दकुन्द, अकलंकदेव अरु, विद्यानन्द आदि मुनि सारे ।
तव कुल-कुमुद चन्द्रमा ये शुभ, शिक्षामृत दे स्वर्ग सिधारे ॥२॥
तूने उत्तम तत्त्व प्रकाशे, जग के भ्रम सब क्षय कर डारे ।
तेरी ज्योति निरख लज्जावश, रवि-शशि छिपते नित्य विचारे ॥३॥
भव-भय पीड़ित, व्यथित-चित्त जन जब जो आये शरण तिहारे ।
छिन भर में उनके तब तुमने, करुणा करि संकट सब टारे ॥४॥
जब तक विषय-कषाय नशें नहिं, कर्म-शत्रु नहिं जाय निवारे ।
तब तक 'ज्ञानानन्द' रहै नित, सब जीवन में समता धारे ॥५॥