जहाँ सत्संग होता है, वहाँ पर नित्य जाओ तुम । हमें फुरसत नहीं कहकर, ये मौका मत गँवाओ तुम ॥टेक॥
अरे सत्संग करने की ना कोई उम्र होती है । अमर ये दीप है इसकी कभी बुझती ना ज्योति है । इसी ज्योति से जीवन की सदा ज्योति जलाओ तुम ॥ हमें फुरसत नहीं कहकर, ये मौका मत गँवाओ तुम ॥१॥
जरा अनुभव तो कर देखो, कि क्या बदलाव आता है । कपट सब दूर होता है, हृदय निर्मल हो जाता है । इन्हीं सत्संगियों के संग में, सदा डुबकी लगाओ तुम ॥ हमें फुरसत नहीं कहकर, ये मौका मत गँवाओ तुम ॥२॥
करके एकाग्र मन को तुम, जाके सत्संग को सुनना । होके तल्लीन भावों के, सुनहरे फूलों को चुनना । इस सत्संग सागर में, सदा डुबकी लगाओ तुम ॥ हमें फुरसत नहीं कहकर, ये मौका मत गँवाओ तुम ॥३॥
चढ़े एक बार फिर उतरे नहीं, सत्संग का ये रंग । बिना प्रभु की कृपा मिलता नहीं सत्संगियों का संग । गुरु संतों की सेवा कर, सदा सान्निध्य पाओ तुम ॥ हमें फुरसत नहीं कहकर, ये मौका मत गँवाओ तुम ॥४॥