जानत क्यों नहिं रे
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राग : विहागरो
जानत क्यों नहिं रे, हे नर आतमज्ञानी
रागद्वेष पुद्गल की संगति, निहचै शुद्धनिशानी ॥टेक॥
जाय नरक पशु नर सुर गतिमें, ये परजाय विरानी ।
सिद्ध-स्वरूप सदा अविनाशी, जानत विरला प्रानी ॥१॥
कियो न काहू हरै न कोई, गुरु सिख कौन कहानी ।
जनम-मरन-मल-रहित अमल है, कीच बिना ज्यों पानी ॥२॥
सार पदारथ है तिहुँ जगमें, नहिं क्रोधी नहिं मानी ।
'द्यानत' सो घटमाहिं विराजै, लख हूजै शिवथानी ॥३॥