nikkyjain@gmail.com

🙏
श्री
Click Here

भरतजी घर में ही वैरागी
Karaoke :

घर में ही वैरागी भरत जी, घर में ही वैरागी
जड़-वैभव से भिन्न स्वयं में, निज वैभव अनुरागी ॥टेक॥

छह खण्डों को तुमने जीता, ये कहने में आया
लेकिन जग की विजय में उनने खुद को हारा पाया
भोर भई समकित की अंतर, रैन मोह के भागे
घर में ही वैरागी भरत जी, घर में ही वैरागी ॥१॥

धन्य-धन्य हैं लोग वही जो, दिव्य-ध्वनी सुन पाते
किन्तु भरतजी छह खण्डों पर, विजय ध्वजा फहराते
भाग्यवान कहे सारी दुनिया, पर समझे वोअभागी
घर में ही वैरागी भरत जी, घर में ही वैरागी ॥२॥

चक्रवर्ती थे छह-खण्डों के, पर अखण्ड अन्तर में
बाहर से भोगी दिखते पर, योगी अभ्यन्तर में
चक्री-पद भी नहीं सुहाए, शुद्धातम रुचि लागी
घर में ही वैरागी भरत जी, घर में ही वैरागी ॥३॥

भाव-लिंगी संतों की प्रतिदिन, भरत प्रतीक्षा करते
नवधा-भक्ति से पडगाहन का भाव हृदय में धरते
हुए एक अन्तर-मुहर्त में, सारे जग के त्यागी
घर में ही वैरागी भरत जी, घर में ही वैरागी ॥४॥

Close

Play Jain Bhajan / Pooja / Path

Radio Next Audio

देव click to expand contents

शास्त्र click to expand contents

गुरु click to expand contents

कल्याणक click to expand contents

अध्यात्म click to expand contents

पं दौलतराम कृत click to expand contents

पं भागचंद कृत click to expand contents

पं द्यानतराय कृत click to expand contents

पं सौभाग्यमल कृत click to expand contents

पं भूधरदास कृत click to expand contents

पं बुधजन कृत click to expand contents

पर्व click to expand contents

चौबीस तीर्थंकर click to expand contents

दस धर्म click to expand contents

selected click to expand contents

नित्य पूजा click to expand contents

तीर्थंकर click to expand contents

पाठ click to expand contents

स्तोत्र click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

द्रव्यानुयोग click to expand contents

loading