मैं निज आतम कब
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मैं निज आतम कब ध्याऊंगा
रागादिक परिनाम त्यागकै,
समतासौं लौ लाऊंगा ॥
मन वच काय जोग थिर करकै,
ज्ञान समाधि लगाऊंगा ।
कब हौं क्षिपकश्रेणि चढ़ि ध्याऊं,
चारित मोह नशाऊंगा ॥१॥
चारों करम घातिया क्षय करि,
परमातम पद पाऊंगा ।
ज्ञान दरश सुख बल भंडारा,
चार अघाति बहाऊंगा ॥२॥
परम निरंजन सिद्ध शुद्धपद,
परमानंद कहाऊंगा ।
'द्यानत' यह सम्पति जब पाऊं,
बहुरि न जग में आऊंगा ॥३॥