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वन्दे जिनवरम्
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बड़ा अचम्भा लगता तू,अपने से अनजान है।
पर्यायों के पार देखले,आप स्वयं भगवान है ।। वन्दे जिनवरम्

मन्दिर,तीर्थ,जिनेन्द्र,जिनागम उसकी खोज बताते हैं,
जप,तप,संयम,शील,साधना में उसको ही ध्याते हैं,
जब तक उसका पता न पाया,दुनियाँ में भरमाते है,
चारों गतियों में दुःख पाकर फिर निगोद में जाते हैं,
पर्यायों को अपना माना यह तेरा अज्ञान है ।। वन्दे जिनवरम्

तू अनन्त गुण का धारी है,अजर अमर सत अविनाशी,
शुद्ध बुद्ध तू नित्य निरंजन,मुक्ति सदन का है वासी,
तुझ में सुख साम्राज्य भरा यों,मीन रहे जल में प्यासी,
अपने को पहचान न पाया ये है भूल तेरी खासी,
तू अचिन्त्य शक्ति का धारी,तू वैभव की खान है।
पर्यायों को अपना माना यह तेरा अज्ञान है ।। वन्दे जिनवरम्

तीनों कर्म नहीं तेरे में,यह तो जड़ की माया है,
तू चेतन है ज्ञान स्वरूपी,क्यों इन में भरमाया है,
सुख की सरिता है स्वभाव में,जिनवर ने बतलाया है,
जिसने अन्तर में खोजा है,उसने प्रभू को पाया है,
जिनवाणी माँ जगा रही क्यों व्यर्थ बना नादान है,
पर्यायों को अपना माना यह तेरा अज्ञान है ।। वन्दे जिनवरम्

नव तत्वों में रहकर जिसने अपना रूप नहीं छोड़ा।
आतम एक रूप रहता है,नहीं अधिक नहीं थोड़ा,
ये पर्यायें क्षण भंगुर हैं इनका तेरा क्या जोड़ा,
शुद्ध बुद्ध बन जाता,जिसने पर्यायों से मुख मोड़ा,
द्रव्य दृष्टि अपना कर प्राणी बन जाता भगवान है |
पर्यायों को अपना माना यह तेरा अज्ञान है ।। वन्दे जिनवरम्

बड़ा अचम्भा लगता तू अपने से अनजान है।
पर्यायों के पार देख ले, आप स्वयं भगवान है।