सन्त निरन्तर चिन्तत
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सन्त निरन्तर चिन्तत ऐसैं,
आतमरूप अबाधित ज्ञानी ॥
रोगादिक तो देहाश्रित हैं,
इनतें होत न मेरी हानी ।
दहन दहत ज्यों दहन न तदगत,
गगन दहन ताकी विधि ठानी ॥१॥
वरणादिक विकार पुद्गलके,
इनमें नहिं चैतन्य निशानी ।
यद्यपि एकक्षेत्र-अवगाही,
तद्यपि लक्षण भिन्न पिछानी ॥२॥
मैं सर्वांगपूर्ण ज्ञायक रस,
लवण खिल्लवत लीला ठानी ।
मिलौ निराकुल स्वाद न यावत,
तावत परपरनति हित मानी ॥३॥
'भागचन्द' निरद्वन्द निरामय,
मूरति निश्चय सिद्धसमानी ।
नित अकलंक अवंक शंक बिन,
निर्मल पंक बिना जिमि पानी ॥४॥