सब जग को प्यारा
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सब जग को प्यारा, चेतनरूप निहारा
दरव भाव नो करम न मेरे, पुद्गल दरव पसारा ॥टेक॥
चार कषाय चार गति संज्ञा, बंध चार परकारा ।
पंच वरन रस पंच देह अरु, पंच भेद संसारा ॥१॥
छहों दरब छह काल छहलेश्या, छहमत भेदतैं पारा ।
परिग्रह मारगना गुन-थानक, जीवथानसों न्यारा ॥२॥
दरसन ज्ञान चरन गुनमण्डित, ज्ञायक चिह्न हमारा ।
सोहं सोहं और सु औरे, 'द्यानत' निहचै धारा ॥३॥