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श्री
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हम अगर वीर वाणी
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तर्ज: तुम अगर साथ देने का

हम अगर वीर वाणी पर श्रद्धा करें,
ज्ञान के दीप जलते चले जाएँगे ॥
गर जले ज्ञान के दीप हृदय में तो,
मार्ग संयम के खुलते चले जाएँगे ॥टेक॥

हमने मुश्किल से पाया है मानव जन्म ।
देव तरसे जिसे, ऐसा पाया रतन ॥
गर इसे हमने विषयों में, ही खो दिया,
भूल पर अपनी हम, खुद ही पछताएंगे ॥
हम अगर वीर वाणी पर श्रद्धा करें,
ज्ञान के दीप जलते चले जाएँगे ॥१॥

अब मिला जिन धर्म, और जिनवर शरण ।
गुरु मिले हैं दिगंबर, और अमृत वचन ॥
राग से भिन्न ज्ञायक है, अनुभव करो,
मार्ग कल्याण के, खुद ही खुल जाएंगे ॥
हम अगर वीर वाणी पर श्रद्धा करें,
ज्ञान के दीप जलते चले जाएँगे ॥२॥

जब नहीं सच्ची श्रद्धा, तो क्या अर्थ है ?
इस बिना ज्ञान और, आचरण व्यर्थ है ॥
हम पुजारी बने, वीतरागी के तो,
कर्म के बंधन, कटते चले जाएंगे ॥
हम अगर वीर वाणी पर श्रद्धा करें,
ज्ञान के दीप जलते चले जाएँगे ॥३॥

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