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अपनी सुधि भूल आप
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अपनी सुधि भूल आप, आप दुख उपायौ,
ज्यौं शुक नभचाल विसरि नलिनी लटकायो ॥

चेतन अविरुद्ध शुद्ध, दरश बोधमय विशुद्ध
तजि जड़-रस-फरस रूप, पुद्गल अपनायौ ॥
अपनी सुधि भूल आप, आप दुख उपायौ ॥१॥

इन्द्रियसुख दुख में नित्त, पाग राग रुख में चित्त
दायकभव विपति वृन्द, बन्धको बढ़ायौ ॥
अपनी सुधि भूल आप, आप दुख उपायौ ॥२॥

चाह दाह दाहै, त्यागौ न ताहि चाहै
समतासुधा न गाहै जिन, निकट जो बतायौ ॥
अपनी सुधि भूल आप, आप दुख उपायौ ॥३॥

मानुषभव सुकुल पाय, जिनवर शासन लहाय
'दौल' निजस्वभाव भज, अनादि जो न ध्यायौ ॥
अपनी सुधि भूल आप, आप दुख उपायौ ॥४॥



अर्थ : हे प्राणी ! तू अपने आपको भूलकर, अपनी सुधि भूलकर आप (स्वयं) ही दुःख को उत्पन्न करता है, दुःख का कारण बनता है। जैसे आकाश में स्वच्छंद उड़ान भरनेवाला तोता रस्सी-बँधी लकड़ी में उलझकर उल्टा लटक जाता है और अपने उड़ान भरने के स्वभाव को भूलकर स्वयं उल्टा लटका हुआ रस्सी-लकड़ी को पकड़कर समझता है कि रस्सी ने उसे पकड़ रखा है ॥1॥

यह चेतन अविरुद्ध है, इसका किसी से विरोध नहीं, यह किसी से विरुद्ध नहीं, पूर्ण शुद्ध है, सम्यक्दर्शन व ज्ञान को धारण करनेवाला है । फिर भी यह अपना स्वभाव भूलकर, जड़रूप होकर स्पर्श-रस रूपमय पुद्गल को ही अपना मान रहा है ॥१॥

यह जीव इंद्रिय सुख-दु:ख, जो संसार में दुःख को उपजानेवाले हैं, उनको ही सब-कुछ समझकर, राग-द्वेष में रत होकर, डूबकर अपनी कर्म-श्रंखला को बढ़ा रहा है; निरंतन कर्म-बंध कर रहा है ॥२॥

यह जीव चाह- इच्छाओं की आग में निरंतर दहक रहा है, तप रहा है, जल रहा है, फिर भी उन इच्छाओं को नहीं छोड़ता और समतारूपी अमृत के पान की चाहना करके भी जिनेन्द्र की भक्ति में अवगाह नहीं करता जबकि यह करना सरल है, सुगम है, तेरे योग्य है, निकट से तुझे बता दिया है, तुझे उपदेश दिया है ॥३॥

हे जीव ! यह मनुष्यभव- श्रेष्ठकुल तुझे मिला है। तुझे जैन-शासन मिला है, धर्म-साथन का अवसर मिला है दौलतराम कहते हैं कि तू अपने निजस्वरूप का चिंतन कर जो अनादि से तूने नहीं किया है ॥४॥