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श्री
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पद्मसद्म
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तर्ज : देखो जी आदीश्वर स्वामी

पद्मसद्म पद्मापद पद्मा, मुक्तिसद्म दरशावन है ।
कलि-मल-गंजन मन अलि रंजन, मुनिजन शरन सुपावन है ॥

जाकी जन्मपुरी कुशंबिका, सुर नर-नाग रमावन है ।
जास जन्मदिनपूरब षटनव, मास रतन बरसावन है ॥

जा तपथान पपोसागिरि सो, आत्म-ज्ञान थिर थावन है ।
केवलजोत उदोत भई सो, मिथ्यातिमिर-नशावन है ॥

जाको शासन पंचाननसो, कुमति मतंग नशावन है ।
राग बिना सेवक जन तारक, पै तसु रुषतुष भाव न है ॥

जाकी महिमा के वरननसों, सुरगुरु बुद्धि थकावन है ।
'दौल' अल्पमति को कहबो जिमि, शशक गिरिंद धकावन है ॥




अर्थ : हे पद्मप्रभ जिनदेव ! आप मोक्षरूपी लक्ष्मी के स्वामी हैं और आपके चरण कमल मुक्ति की दिशा - स्थान को बतानेवाले हैं । आप पापरूपी मैल का नाश करनेवाले हैं, आप मनरूपी भ्रमर को प्रसन्नता देनेवाले कमल हैं, मुनिजनों के लिए पवित्र शरणदाता हैं।

सुर, नर और नाग सभी के मन को भानेवाली कोशांबी नगरी जिनकी जन्मस्थली है । जिनके जन्म से पंद्रह मास पूर्व से वहाँ रत्नों की वर्षा होने लगी थी।

पपोसा पर्वत जिनका तपस्थान है जो आत्मज्ञान में एकाग्र होने का, स्थिर होने का स्थान है। वहाँ ही आपने मिथ्यात्वरूपी अंधकार का नाश करनेवाले कैवल्य को प्राप्त किया।

आपका उपदेश सिंह की भाँति मिथ्यात्वरूपी हाथी का नाश करनेवाला है। आप बिना किसी राग के उन सेवकजनों को तारते हो जिनके कुछ भी राग-द्वेष - ममत्व नहीं रहता अर्थात् जो राग-द्वेषरहित होकर समतावान होते हैं आप उन्हें तारते हो।

जिनकी महिमा का वर्णन करने के लिए वृहस्पति भी समर्थ नहीं हैं। दौलतराम कहते हैं कि जैसे खरगोश सुमेरु पर्वत को धकेलने का प्रयास करे, उसी भाँति मैं अल्पमति उस महिमा का वर्णन किस प्रकार कर सकता हूँ अर्थात् समर्थ नहीं हूँ।
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