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श्री
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हो तुम त्रिभुवन तारी
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हो तुम त्रिभुवन-तारी हो जिनजी, मो भव-जलधि क्‍यों न तारत हो ॥
अंजन कियो निरंजन तातें, अधम-उधार विरद धारत हो ।
हरि, वराह, मर्कट झट तारे, मेरी बार ढील पारत हो ॥
यों बहु अधम उधारे तुम तौ, मैं कहा अधम न मोहि टारत हो ?
तुमको करनो परत न कछु शिव-पथ लगाय भव्यनि तारत हो ॥
तुम छवि निरखत सहज टरे अघ, गुणचिन्तत विधि-रज झारत हो ।
'दौल' न और चहै मोहि दीजे, जैसी आप भावना रत हो ॥



अर्थ : हे जिनेन्द्रदेव ! आप तो तीनों लोकों को तारनेवाले हो, फिर मुझे इस संसार-सागर से क्यो नहीं तारते हो ?
आपने अंजन (चोर) को भी निरंजन (शुद्ध आत्मा) बना दिया था, अतः आप इस जगत में अधम-उद्धारक के यश को धारण करते हो। इसी प्रकार आपने सिंह, सुअर, बन्दर आदि को भी शीघ्र तार दिया था, तब फिर हे प्रभो ! आप मेरी वार ही क्‍यों देर कर रहे हो ? इसीप्रकार आपने अन्य भी बहुत्त से अधम जीवों का उद्धार किया है; तब कया मैं अधम नहीं हूँ, जो आप मुझे टाल रहे हो?
हे प्रभो ! भव्य जीवों का उद्धार करने के लिए आपको करना कुछ भी नहीं पडता है। आप तो केवल उनको मोक्षमार्ग में लगा देते हो, बस ।
हे प्रभो ! आपको देखने से पाप सहज ही दूर हो जाते हैं और आपके गुणों का चिन्तवन करने से कर्मरूपी रज स्वयमेव झड जाती है । कविवर दौलतराम कहते हैं कि हे जिनेन्द्रदेव ! मुझे अन्य कुछ नहीं चाहिए, मुझे तो केवल एक यही दीजिए कि जिस प्रकार आप शुद्धभावना में लीन हैं, उसी प्रकार में भी शुद्धभावना में लीन हो जाऊँ ।
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