अहो यह उपदेश माहीं
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अहो यह उपदेश माहीं, खूब चित्त लगावना ।
होयगा कलयान तेरा, सुख अनन्त बढ़ावना ॥टेक॥
रहित दूषन विश्वभूषन, देव जिनपति ध्यावना ।
गगनवत निर्मल अचल मुनि, तिनहिं शीस नवावना ॥
अहो यह उपदेश माहीं, खूब चित्त लगावना ॥१॥
धर्म अनुकम्पा प्रधान, न जीव कोई सतावना ।
सप्ततत्त्व परीक्षा करि, हृदय श्रद्धा लावना ॥
अहो यह उपदेश माहीं, खूब चित्त लगावना ॥२॥
पुद्गलादिक तैं पृथक, चैतन्य ब्रह्म लखावना ।
या विधि विमल सम्यक्त्व धरि, शंकादि पंक बहावना ॥
अहो यह उपदेश माहीं, खूब चित्त लगावना ॥३॥
रुचै भव्यन को वचन जे, शठन को न सुहावना ।
चन्द्र लखि जिमि कमुद विकसै, उपल नहिं विकसावना ॥
अहो यह उपदेश माहीं, खूब चित्त लगावना ॥४॥
'भागचन्द' विभाव तजि, अनुभव स्वभावित भावना ।
या शरण न अन्य जगतारन्य मे कहु पावना ॥५॥