जिन स्व पर हिताहित चीना
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जिन स्व-पर हिताहित चीना, तिनका ही साचा जीना ॥टेक॥
जिन बुध-छैनी पैनी तैं ,जड़ रूप निराला कीना ।
पर तैं विरचि आपसे राचे, सकल विभाव विहीना ॥
जिन स्व-पर हिताहित चीना, तिनका ही साचा जीना ॥१॥
पुन्य पाप विधि बंध उदय में, प्रमुदित होत न दीना ।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरन निज भाव सुधारस भीना ॥
जिन स्व-पर हिताहित चीना, तिनका ही साचा जीना ॥२॥
विषयचाह तजि निज वीरज सजि करत पूर्वविधि छीना ।
'भागचन्द' साधक ह्वै साधन, साध्य स्वपद स्वाधीना ॥
जिन स्व-पर हिताहित चीना, तिनका ही साचा जीना ॥३॥