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सबसों छिमा छिमा कर
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राग गौरी, मान न कीजिए ओ परवीन

सबसों छिमा छिमा कर जीव !
मन वच तनसों वैर भाव तज, भज समता जु सदीव ॥टेक॥

तपतरु उपशम जल चिर सींच्यो, तापस शिवफल हेत ।
क्रोध अगनि छिनमाहिं, जरावै, पावै नरक-निकेत ॥
सबसों छिमा छिमा कर जीव ॥१॥

सब गुनसहित गहत रिस मनमें, गुन औगुन ह्वै जात ।
जैसैं प्रानदान भोजन ह्वै, सविष भये तन घात ॥
सबसों छिमा छिमा कर जीव ॥२॥

आप समान जान घट घटमें, धर्ममूल यह वीर ।
'द्यानत' भवदुखदाह बुझावै, ज्ञान सरोवर नीर ॥
सबसों छिमा छिमा कर जीव ॥३॥



अर्थ : हे जीव! तू सब प्राणियों के प्रति क्षमा-भाव रख । सबके प्रति मन, वचन और काय से बैरभाव छोड़कर सदा समताभाव ही में लीन रह ।

वह तपस्वी जो तपरूपी वृक्ष को, उपशमरूपी जल से सदा सींचता है वह मोक्षरूपी फल पाता है और जो क्रोध करता है उसे क्रोध की अग्नि में एक क्षण में ही नष्ट कर देती है, जला देती है और वह नरक का निवास पाता है।

सारे गुणों के होते हुए भी मन में केवल क्रोध के उत्पन्न होने पर सब गुण अवगुण हो जाते हैं । जैसे भोजन से प्राणदान मिलता है, परन्तु उसमें विषाणुओं के मिल जाने से वह ही प्राणलेवा बन जाता है।

सब जीवों को आप अपने समान जानो। अरे भाई! यही धर्म का मूल है, सार है। द्यानतराय कहते हैं कि ऐसे ज्ञानरूपी सरोवर का जल भव-दुःखरूपी दाह को बुझाता है, शमन करता है, नष्ट करता है।