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भैया सो आतम जानो रे
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भैया! सो आतम जानो रे! ॥टेक॥

जाके बसते बसत है रे, पाँचों इन्द्री गाँव ।
जास बिना छिन एकमें रे, गाँव न नाँव न ठाँव ॥
भैया! सो आतम जानो रे! ॥१॥

आप चलै अरु ले चलै रे, पीछैं सौ मन भार ।
ता बिन गज हल ना सके रे, तन खींचै संसार ॥
भैया! सो आतम जानो रे! ॥२॥

जाको जारैं मारतैं रे, जरै मरै नहिं कोय ।
जो देखै सब लोककों रे, लोक न देखै सोय ॥
भैया! सो आतम जानो रे! ॥३॥

घटघटव्यापी देखिये रे, कुंथू गजसम रूप ।
जानै मानै अनुभवै रे, 'द्यानत' सो चिद्रूप ॥
भैया! सो आतम जानो रे! ॥४॥



अर्थ : भैया! अपनी आत्मा को जानो

जिसके बसने से पाँच इन्द्रियोंवाला गाँव (देह) बस जाता है, सक्रिय हो जाता है । जिसके अभाव में एक ही क्षण में न वह गाँव (देह) रहता है और न उसका नाम रहता है और न कोई ठिकाना ही रहता है, उस आत्मा को जानो ।

जब तक शरीर में आत्मा रहती है तब तक यह शरीर अपने आप चलता है और अपने साथ सौ-मन का भार भी लिये चलता है । इसके बिना (आत्मा के बिना) शरीर एक गज भी नहीं हिल सकता फिर तो उस शरीर को संसार के लोग खींचते हैं ।

इस तन को जलाने से, मारने से वह आत्मा न जलता है और न मरता है, वह सारे लोक को देखता है, पर वह लोक को दिखाई नहीं देता, उस आत्मा को जानो ।

यह आत्मा घट-घट में, प्रत्येक शरीर में है । चाहे वह कुंथु-सी छोटी देह हो या हाथी के समान बड़ा रूप-आकार हो । द्यानतराय कहते हैं कि जो उस आत्मा को जानता व मानता है और अनुभव करता है, वह ही चिद्रूप है ।
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