रे जिय क्रोध काहे करै
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राग : केदारो
रे जिय! क्रोध काहे करै ।
देखकै अविवेकि प्रानी, क्यों विवेक न धरै ॥टेक॥
जिसे जैसी उदय आवै, सो क्रिया आचरै ।
सहज तू अपनो बिगारै, जाय दुर्गति परै ॥
रे जिय! क्रोध काहे करै ॥१॥
होय संगति-गुन सबनिकों, सरव जग उच्चरै ।
तुम भले कर भले सबको, बुरे लखि मति जरै ॥
रे जिय! क्रोध काहे करै ॥२॥
वैद्य परविष हर सकत नहिं, आप भखि को मरै ।
बहु कषाय निगोद-वासा, छिमा 'द्यानत' तरै ॥
रे जिय! क्रोध काहे करै ॥३॥