श्रीजिनधर्म सदा जयवन्त
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राग : असावरी
श्रीजिनधर्म सदा जयवन्त
तीन लोक तिहुँ कालनिमाहीं, जाको नाहीं आदि न अन्त ॥श्री॥
सुगुन छियालिस दोष निवारैं, तारन तरन देव अरहंत
गुरु निरग्रंथ धरम करुनामय, उपजैं त्रेसठ पुरुष महंत ॥श्री॥
रतनत्रय दशलच्छन सोलह-कारन साध श्रावक सन्त
छहौं दरब नव तत्त्व सरधकै, सुरग मुकति के सुख विलसन्त ॥श्री॥
नरक निगोद भ्रम्यो बहु प्रानी, जान्यो नाहिं धरम-विरतंत
'द्यानत' भेदज्ञान सरधातैं, पायो दरव अनादि अनन्त ॥श्री॥