कोटि-कोटि मुँह से जो तेरी महिमा सुनते आया । इससे भी तू है बढ़ा-चढ़ा है यह दर्शन कर पाया ॥ इस पृथ्वी पर बड़ा कठिन है, तुमसा पाना जोड़ा । तेरे दर्शन को मन दौड़ा ॥१॥
कर पर कर धर नाशा दृष्टि आसन अटल जमाया । परदोष रोष अम्बर आडम्बर रहित तुम्हारी काया । वीतराग विज्ञान कला से, जगबन्धन को तोड़ा । तेरे दर्शन को मन दौड़ा ॥२॥
पुण्य पाप व्यवहार जगत के हैं सब भव के कारण । शुद्ध चिदानन्द चेतन दर्शन निश्चय पार उतारण ॥ निजपद का 'सौभाग्य' श्रेष्ठ पा, कैसे जाये छोड़ा । तेरे दर्शन को मन दौड़ा ॥३॥