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श्री
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गाफिल हुवा कहाँ तू डोले
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राग : भैरवी

गाफिल हुवा कहाँ तू डोले, दिन जाते तेरे भरती में ॥टेक॥

चोकस करत रहत है नाहीं, ज्यों अंजुलि जल झरती में ।
तैसे तेरी आयु घटत है, बचै न बिरिया मरती में ॥१॥

कंठ दबै तब नाहिं बनेगो, काज बनाले सरती में ।
फिर पछताये कुछ नहिं होवै, कूप खुदै नहीं जरती में ॥२॥

मानुष भव तेरा श्रावक कुल, यह कठिन मिला इस धरती में ।
'भूधर' भवदधि चढ़ नर उतरो, समकित नवका तरती में ॥३॥



अर्थ : हे मानव! त बेसुध होकर कहाँ भटक रहा है? तेरी आय के दिन बीतते जाते हैं, चुकते जाते हैं। जैसे अंगुलि में भरा जल यल करने पर भी छिद्रों में से झरता जाता है, ठहरता नहीं है वैसे तेरी आयु भी घटती जाती है और चुक जाती है तो मरण समय आ जाता है, ऐसा विचारकर तू सावधान क्यों नहीं होता!
जब मृत्यु समीप आयेगी तब तू कुछ भी नहीं कर सकेगा। इसलिए समय रहते चेत, अपना कार्य सिद्ध कर । जब आग लग जाय, उस समय कुआँ खोदने से प्रयोजन नहीं सधता। उस समय पछताने से कुछ नहीं बनता।
भूधरदास कहते हैं कि इस पृथ्वी पर, इस कर्मभूमि में तुझे यह दुर्लभ मनुष्यभव और उत्तम श्रावक कुल की प्राप्ति हुई है, अतः सम्यक्त्वरूपी नौका में बैठकर इस संसार-सागर से पार उतरने का यह ही सुअवसर है।
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