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जिनराज चरन मन मति बिसरै
Karaoke :
राग नट

जिनराज चरन मन मति बिसरै ॥टेक॥
को जानैं किहिंवार कालकी, धार अचानक आनि परै ॥

देखत दुख भजि जाहिं दशौं दिश पूजन पातकपुंज गिरै ।
इस संसार क्षारसागरसौं, और न कोई पार करै ॥१॥

इक चित ध्यावत वांछित पावत, आवत मंगल विघन टरै ।
मोहनि धूलि परी माँथे चिर, सिर नावत ततकाल झरै ॥२॥

तबलौं भजन संवार सयानैं, जबलौं कफ नहिं कंठ अरै ।
अगनि प्रवेश भयो घर 'भूधर', खोदत कूप न काज सरै ॥३॥



अर्थ : रे मन, तू कभी भी जिनेन्द्र भगवान के चरणों को मत भूल ।
रे मन किसे मालूम है, कब काल गरजता हुआ आ पहुँचेगा और अचानक ही हमें अपना ग्रास बना लेगा ।

जिनराज के चरण सामान्य चरण नहीं हैं । उनके दर्शन मात्र से समस्त दुःख दसों दिशाओं में भाग जाते हैं और पूजा करने से समस्त पाप-समूह खिर जाते हैं । और कोई ऐसा देव नहीं है, जो प्राणियों को इस संसार-सागर से पार होने का कोई
हितकर मार्ग दिखला सके ।

भगवान के चरणों का तन्‍मयता के साथ ध्यान करने से जो शुभ उपयोग रहता है उससे मन-चिन्तित वस्तु की प्राप्ति होती है, मंगल और आनन्द के प्रसंग आते हैं और समस्त विघ्न-बाधाएँ विलीन हो जाती हैं । इतना ही नहीं, मस्तक पर जो मोह-रज विद्यमान रहती है, वह भी भगवान के चरणों में सिर झुकाते ही तत्काल झर जाती है ।

अरे चतुर जन, जब तक कण्ठ में कफ नहीं अटकता है, बुढ़ापा आकर नहीं घेरता है, तब तक जिनराज की भक्ति के लिए-- उनके आदर्श को अपने जीवन में मूर्तमन्‍त करने के लिए तुझे कटिबद्ध रहना चाहिए। यह विश्वास रख, बुढ़ापे की
दयनीय दशा में इतना उत्साह और बल नहीं रहता है कि किसी एक नूतन और कठिन आदर्श को अपनी श्रद्धा, निष्ठा और व्यवहार का विषय बनाया जा सके। फिर कदाचित्‌ इस ओर प्रवृत्ति की भी जाती है तो उससे लक्ष्य में पूर्ण सफलता नहीं मिल
पाती और इस अवस्था की यह प्रवृत्ति प्राय: इसी प्रकार असफल रहती है जिस प्रकार किसी के घर में आग लगने पर वह कुआँ खोदकर उसे बुझाने का प्रयत्न करे। उस समय न कुआँ ही खुद पाता है, न आग ही बुझ पाती है और न चिर-संचित गृहस्थी की सामग्री ही बच पाती है। यही हाल बुढ़ापे में प्रारम्भ की गयी जिन-भक्ति का है। इस अवस्था में असंस्कृत होने से न वह भक्ति की साधना तक पहुँच पाता है, न उसे शान्ति और निराकुलता मिल पाती है और फलत: जीवन भी यों हो अन्धकार में टटोलते-भटकते निकल जाता है। अत: मन, भक्ति और साधना का अवसर कदापि हाथ से नहीं खोना चाहिए ।

रे मन, तू कभी भी भगवान जिनेन्द्र के चरणों को न भूल। किसे मालूम है, काल कब गरजता हुआ आ पहुँचेगा और अचानक ही हमें अपना ग्रास बना लेगा ।