रत्नत्रय निधि उर धरैं
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रत्नत्रय निधि उर धरैं, अरु निर्ग्रन्थ त्रिकाल ।
मार्यो कामखबीस को, स्वामी परम दयाल ।। ते गुरु. ।।
पंच महाव्रत आदरें, पांचों समिति समेत ।
तीन गुप्ति पालें सदा, अजर-अमर पद हेत ।। ते गुरु. ।।
धर्म धरैं दशलाछनी, भावैं भावन सार ।
सहैं परिषह बीस द्वै, चारित-रतन-भण्डार ।। ते गुरु. ।।
जेठ तपै रवि आकरो, सूखे सरवर नीर ।
शैल-शिखर मुनि तप तपैं, दाझें नगन शरीर ।। ते गुरु. ।।
पावस रैन डरावनी, बरसे जलधरधार ।
तरुतल निवसै तब यती, बाजै झंझा ब्यार ।। ते गुरु. ।।
शीत पडै कपि-मद गले, दाहै सब वनराय ।
तालतरंगनी के तटैं, ठाड़े ध्यान लगाय ।। ते गुरु. ।।
इह विधि दुद्धर तप तपै, तीनों काल मंझार ।
लागे सहज सरूप मैं, तनसों ममत निवार ।। ते गुरु. ।।
पूरब भोग न चिंतवै, आगम बांछै नाहिं ।
चहुंगति के दुःखसों हरे, सुरति लगी शिव माहिं ।॥ ते गुरु. ।
रंग महल में पौढ़ते, कोमल सेज बिछाय ।
ते पच्छिम निशि भूमि मैं, सोवें संवरि काय ॥ ते गुरु. ।।
गज चढ़ि चलते गरवसों, सेना सजि चतुरंग ।
निरखि निरखि पग वे धरै, पाले करुणा अंग। ते गुरु. ।।
ये गुरुचरण जहाँ धरै, जग में तीरथ जेह।
सो रज मम मस्तक चढ़ो, 'भूधर' मांगे एह ॥ ले गुरु. ।।