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श्री
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अहो दोऊ रंग भरे
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राग : सोरठ

अहो दोऊ रंग भरे खेलत होरी, अलख अमूरति की जोरी ॥टेक॥

इतमैं आतम राम रंगीले, उतमैं सुबुद्धि किसोरी ।
या कै ज्ञान सखा संग सुन्दर, बाकै संग समता गोरी ॥१॥

सुचि मन सलिल दया रस केसरि, उदै कलस में घोरी ।
सुधी समझि सरल पिचकारि, सखिय प्यारी भरि भरि छोरी ॥२॥

सत-गुरु सीख तान धुरपद की, गावत होरा होरी ।
पूरव बंध अबीर उड़ावत, दान गुलाल भर झोरी ॥३॥

'भूधर' आजि बड़े भागिन, सुमति सुहागिन मोरी ।
सो ही नारि सुलछिनी जग में, जासौं पतिनै रति जोरी ॥३॥



अर्थ : अहो, देखो आत्मा व सुमति दोनों रंग भर- भरकर होली खेलते हैं । यह अलख-अदृश्य, न दिखाई देनेवाली की और अमूर्त की जोड़ी है।

एक ओर तो ज्ञानरंगों से रंगीले आत्माराम हैं और दूसरी परिपक्वता की ओर अग्रसर सुबुद्धि सुमतिरूपी किशोरी है। एक के ( आत्मा के) साथ मित्ररूप में ज्ञान है तो दूसरे के (सुमति के) साथ समता-रूपी सहेली।

आत्मा देहरूपी कलश में, जल के समान शुद्ध मन में करुणारस की दया की केशर पोलकर विवेकसहित सरल भावों की पिचकारी भर-भरकर सखियों पर छोड़ रही है, अर्थात् करुणाभाव सर्वांग से मुखरित है।

जैसे होली के अवसर पर गाई जानेवाली ध्रुपद में काफी थाट की धुन-बंदिश अत्यन्त मधुर होती है, वैसे ही सत्गुरु का सदुपदेश अत्यन्त मनमोहक व सुग्राहय होता है, जिसे हृदयंगम करने पर आत्मानुभूति से बंधी कर्म-शृंखला उदय में आकर निर्जरित होती है, अबीर की भाँति उड़ती जाती है।

भूधरदास जी कहते हैं कि बड़े भाग्य से आज यह सुमति सुहागिन मेरी हुई है अर्थात् मुझे विवेक जागृत हुआ। आत्मारूपी वर के लिए सुमति (सम्यकजान) ही एकमात्र योग्य सुलक्षणा वधू है, इसके साथ की गई प्रीति ही फलदायक है।
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