तैं क्या किया नादान तैं
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तैं क्या किया नादान, तैं तो अमृत तजि विष लीना ॥टेक॥
लख चौरासी जौनी माहिं तैं, श्रावक कुल में आया ।
अब तजि तीन लोक के साहिब, नवग्रह पूजन धाया ॥
तैं क्या किया नादान, तैं तो अमृत तजि विष लीना ॥१॥
वीतराग के दरसन ही तैं, उदासीनता आवै ।
त तौ जिनके सनमुख ठाडा, सत को ख्याल खिलावै ॥
तैं क्या किया नादान, तैं तो अमृत तजि विष लीना ॥२॥
सुरग सम्पदा सहजै पावै, निश्चय मुक्ति मिलावै ।
ऐसी जिनवर पूजन सेती, जगत कामना चावै ॥
तैं क्या किया नादान, तैं तो अमृत तजि विष लीना ॥३॥
'बुधजन' मिलें सलाह कहैं तब, तू वापै खिजि जावे ।
जथा जोग कौं अजथा माने, जनम-जनम दुख पावै ॥
तैं क्या किया नादान, तैं तो अमृत तजि विष लीना ॥४॥