दीन दु:खी असमर्थ दरिद्री, निर्धन तन-रोगी, सिद्धचक्र का ध्यान भये ते, सुर-नर-सुख भोगी ॥
डाकिनि शाकिनि भूत पिशाचिनि, व्यंतर उपसर्गा, नाम लेत भगि जायँ छिनक, में सब देवी दुर्गा ॥
बन रन शत्रु अग्नि जल पर्वत, विषधर पंचानन, मिटे सकल भय,कष्ट हरे, जे सिद्धचक्र सुमिरन ॥
मैनासुन्दरि कियो पाठ यह, पर्व-अठाइनि में, पति-युत सात शतक कोढ़िन का, गया कुष्ठ छिन में ॥
कार्तिक फाल्गुन साढ़ आठ दिन, सिद्धचक्र-पूजा, करें शुद्ध-भावों से 'मक्खन', लहे न भव-दूजा ॥ जय सिद्धचक्र देवा, जय सिद्धचक्र देवा ॥ करत तुम्हारी निश-दिन, मन से सुर-नर-मुनि सेवा ॥