अमृतझर झुरि झुरि आवे
Karaoke :
तर्ज : जीव तू भ्रमत सदीव अकेला
अमृतझर झुरि-झुरि आवे जिनवाणी ॥टेक॥
द्वादशांग बादल ह्वै उमड़े, ज्ञान अमृत रसखानी ॥१॥
स्याद्वाद बिजुरी अति चमके, शुभ पदार्थ प्रगटानी ।
दिव्यध्वनी गंभीर गरज है, श्रवण सुनत सुखदानी ॥
अमृतझर झुरि-झुरि आवे जिनवाणी ॥२॥
भव्यजीव-मन भूमि मनोहर, पाप कूड़कर हानी ।
धर्म बीज तहाँ ऊगत नीको, मुक्ति महाफल ठानी ॥
अमृतझर झुरि-झुरि आवे जिनवाणी ॥३॥
ऐसी अमृतझर अति शीतल, मिथ्या तपत भुजानी ।
'बुधमहाचन्द' इसी झर भीतर, मग्न सफल सो ही जानी ॥
अमृतझर झुरि-झुरि आवे जिनवाणी ॥४॥