अहो दोऊ रंग भरे
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राग : सोरठ
अहो दोऊ रंग भरे खेलत होरी, अलख अमूरति की जोरी ॥टेक॥
इतमैं आतम राम रंगीले, उतमैं सुबुद्धि किसोरी ।
या कै ज्ञान सखा संग सुन्दर, बाकै संग समता गोरी ॥१॥
सुचि मन सलिल दया रस केसरि, उदै कलस में घोरी ।
सुधी समझि सरल पिचकारि, सखिय प्यारी भरि भरि छोरी ॥२॥
सत-गुरु सीख तान धुरपद की, गावत होरा होरी ।
पूरव बंध अबीर उड़ावत, दान गुलाल भर झोरी ॥३॥
'भूधर' आजि बड़े भागिन, सुमति सुहागिन मोरी ।
सो ही नारि सुलछिनी जग में, जासौं पतिनै रति जोरी ॥३॥