चेतन खेलै होरी
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चेतन खेलै होरी ।
सत्ता भूमि छिमा वसन्त में, समता प्रान प्रिया संग गोरी ॥टेक॥
मन को कलश प्रेम को पानी, तामें करूना केसर घोरी ।
ज्ञान-ध्यान पिचकारी भरि भरि, आपमें छारै होरा होरी ॥१॥
गुरु के वचन मृदंग बजत हैं, नय दोनों डफ ताल टकोरी ।
संजम अतर विमल व्रत चोवा, भाव गुलाल भरै भर झोरी ॥२॥
धरम मिठाई तप बहु मेवा, समरस आनन्द अमल कटोरी ।
'द्यानत' सुमति कहै सखियन सों, चिरजीवो यह जुग-जुग जोरी ॥३॥