ज्ञानी ऐसे होली मचाई
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तर्ज : ऐसा योगी क्यों न अभयपद पाए
ज्ञानी ऐसे होली मचाई ॥टेक॥
राग कियो विपरीत विपन-घर, कुमति कुसौति भगाई ।
धर दिगम्बर कीन्ह सुसंवर, निज-पर-भेद लखाई ।
घात विषयन की बचाई ॥
ज्ञानी ऐसे होली मचाई ॥१॥
कुमति सखा भज ध्यान भेद सज, तन में तान उड़ाई ।
कुम्भक ताल मृदंग सो पूरक, रेचक बीन बजाई ।
लगन अनुभव सों लगाई ॥
ज्ञानी ऐसे होली मचाई ॥२॥
कर्म बलीता रूप नाम अरि, वेद सुइन्द्रि गनाई ।
दे तप-अग्नि भस्म करि तिनको, धूलि-अघाति उड़ाई ।
करी शिवतिय सों मिलाई ॥
ज्ञानी ऐसे होली मचाई ॥३॥
ज्ञान को फाग भागवश आवे, लाख करो चतुराई ।
सो गुरु दीनदयाल कृपा करि, 'दौलत' तोहि बताई ।
नहीं चित से विसराई ॥
ज्ञानी ऐसे होली मचाई ॥४॥