अजितनाथ सों मन लावो रे
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अजितनाथ सों मन लावो रे ॥टेक॥
करसों ताल वचन मुख भाषौ, अर्थ में चित्त लगावो रे ॥
ज्ञान दरस सुख बल गुनधारी, अनन्त चतुष्टय ध्यावो रे ।
अवगाहना अबाध अमूरत, अगुरु अलघु बतलावो रे ॥
अजितनाथ सों मन लावो रे ॥१॥
करुनासागर गुनरतनागर, जोतिउजागर भावो रे ।
त्रिभुवननायक भवभयघायक, आनंददायक गायो रे ॥
अजितनाथ सों मन लावो रे ॥२॥
परमनिरंजन पातकभंजन, भविरंजन ठहरायो रे ।
'द्यानत' जैसा साहिब सेवो, तैसी पदवी पावो रे ॥
अजितनाथ सों मन लावो रे ॥3॥