निरखत जिन चंद्रवदन
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निरखत जिनचन्द्र-वदन, स्वपदसुरुचि आई ॥टेक॥
प्रगटी निज आनकी, पिछान ज्ञान भानकी
कला उदोत होत काम, जामिनी पलाई ॥१॥
शाश्वत आनन्द स्वाद, पायो विनस्यो विषाद
आन में अनिष्ट इष्ट, कल्पना नसाई ॥२॥
साधी निज साधकी, समाधि मोह व्याधिकी
उपाधि को विराधिकैं, आराधना सुहाई ॥३॥
धन दिन छिन आज सुगुनि, चिंतें जिनराज अबै
सुधरे सब काज 'दौल', अचल ऋद्धि पाई ॥४॥