देख्या मैंने नेमिजी
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देख्या मैंने नेमिजी प्यारा ॥टेक॥
मूरति ऊपर करों निछावर, तन धन जीवन जीवन सारा ॥
जाके नख की शोभा आगैं, कोटि काम छवि डारौं वारा ।
कोटि संख्य रवि चन्द छिपत हैं, वपु की द्युति है अपरंपारा ॥१॥
जिनके वचन सुनें जिन भविजन, तजि गृह मुनिवर को व्रत धारा ।
जाको जस इन्द्रादिक गावैं, पावैं सुख नासैं दुख भारा ॥२॥
जाके केवलज्ञान बिराजत, लोकालोक प्रकाशन हारा ।
चरन गहेकी लाज निवाहो, प्रभुजी 'द्यानत' भगत तुम्हारा ॥३॥