पारस जिन चरन निरख
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तर्ज : अपनी सुधी भूल आप आप
निरखत जिन चन्द्रवदन
पारस जिन चरन निरख, हरख यों लहायो,
चितवन चन्दा चकोर, ज्यों प्रमोद पायो ॥टेक॥
ज्यों सुन घनघोर शोर, मोर हर्ष को न ओर,
रंक निधिसमाज राज, पाय मुदित थायो ॥
पारस जिन चरन निरख, हरख यों लहायो ॥१॥
ज्यों जन चिरछुधित होय, भोजन लखि सुखित होय,
भेषज गदहरन पाय, सरुज सुहरखायो ॥
पारस जिन चरन निरख, हरख यों लहायो ॥२॥
वासर भयो धन्य आज, दुरित दूर परे भाज,
शांतदशा देख महा, मोहतम पलायो ॥
पारस जिन चरन निरख, हरख यों लहायो ॥३॥
जाके गुन जानन जिम, भानन भवकानन इम,
जान 'दौल' शरन आय, शिवसुख ललचायो ॥
पारस जिन चरन निरख, हरख यों लहायो ॥४॥