जय शिव-कामिनि-कन्त ! वीर भगवन्त अनन्त सुखाकर हैं । विधि-गिरि-गंजन बुध-मन-रंजन, भ्रम-तम-भंजन भाकर हैं ॥
जिन उपदेश्यो दुविध धर्म जो, सो सुर-सिद्ध-रमाकर हैं । भवि-उर-कुमुदिन-मोदन भव-तप-हरन अनूप निशाकर हैं ॥ परम विराग रहें जगतैं पै, जगत-जीव रक्षाकर हैं । इन्द्र फणीन्द्र खगेन्द्र चन्द्र जग-ठाकर ताके चाकर हैं ॥
जासु अनन्त सुगुण मणिगण, नित गणते मुनिजन थाक रहैं । जा प्रभु पद नव केवल लब्धि सु, कमला को कमलाकर हैं ॥ जाके ध्यान-कृपान राग-रुष, पास-हरन समताकर हैं । 'दौल' नमें कर जोर हरन भव-बाधा शिवराधाकर हैं ॥